लॉकडाउन का दर्द:परदे में छिपे भूखे बच्चे, खुद्दारी ने कुछ मांगने न दिया
क्रांतिकारी लेखक यशपाल की कहानी 'परदा' आपको याद है? वही चौधरी पीरबख्श की कहानी। जिनके घर का परदा सूदखोर पंजाबी खान ने नोच फेंका था। महज सवा रुपए कर्ज की वसूली के लिए। चौधरी के घर में पुरानी रईसी की निशानी बस परदा ही था। लॉकडाउन ने समाज में ऐसे कई परदे उघाड़ डाले हैं। तमाम परिवारों में इस बीच फाकाकशी हुई है, जो जर्जर हवेलियों में रहते हैं। उन घरों में भी बच्चे भूखे सोए हैं, जिन्हें समाज खाता-पीता मानता है।
बच्चों के फाकों से ऐसे उठे परदे
पड़रौना में खाने के पैकेट भेजने को मोहल्लेवार गरीबों की सूची बनवाई गई। नगर पालिका चेयरमैन विनय जायसवाल बताते हैं,'मैं खुद पैकेट बांट रहा था।रविवार को एक घर में खाना पहुंचाने गया तो वह परिवार सम्मान करते हुए अंदर बुला ले गया। वहां से छत पर। मैंने देखा- पड़ोस के एक की छत पर दो-तीन बच्चे मेरे हाथ में खाने के पैकेट बड़े गौर से देख रहे थे। मैंने उन्हें बुलाकर पूछा।
लॉकडाउन ने यशपाल की प्रसिद्ध कहानी ‘परदा' के चौधरी पीरबख्श जैसे पात्र उजागर किए, खाने के भी लाले पड़े, समाजसेवियों की नजर पड़ी तब मिला भोजन
छोटा बच्चा कुछ बोलने जा रहा था कि उसकी बड़ी बहन ने डांट दिया। छोटा बच्चा खामोश हो गया।वे मेरे परिचित हैं।बात करते हुए उन्हें साथ लेकर उनके किचन में घुसा तो पता चला, बीती रात घर में कुछ नहीं बना था। बच्चे पिछली शाम से भूखे थे। इस परिवार ने किसी से यह बात साझा नहीं थी।'
फिर तो ऐसे कई परिवार मिले
यह कल्पनातीत था। यह परिवार दो दशक पहले तक अच्छा संपन्न परिवार था। वक्त के साथ रईसी गई। अब परिवार के मुखिया एक दुकान में काम करते हैं। ठीक उसी तरह जैसे परदा के चौधरी पीरबख्श तेल मिल में मुंशी थे। रोज कमाने-खाने की हालत है। लॉकडाउन में कारोबार बंद हुआ तो उनकी कमाई भी मारी गई। फिर तो पूरे शहर में टटोला गया। एक बार की जांच में ही 37 ऐसे परिवार मिले, जिनमें फाकाकशी हुई होगी, यह कोई सोच भी नहीं सकता। लेकिन यह सच है। पूरे शहर में ऐसे सौ से अधिक परिवार सामने आए हैं। ये या तो पुराने रईस हैं या फिर खाते-पीते संपन्न परिवार रहे हैं। मगर आज वे हालात के हाथों मोहताज हैं। गरीबी उन्हें खाने नहीं देती। खुद्दारी उन्हें मांगने नहीं दे रही।
सरकारी लाभ भी नहीं मिल सकता
पुरानी रईसी का लबादा इन परिवारों का दोहरा नुकसान कर रहा है। यह गरीबों में शुमार नहीं हो पाते। ऐसे में सरकारी सुविधाएं भी नहीं मिलतीं। अपनी ही बिरादरी के संपन्न लोग उन्हें दिहाड़ी का काम न दें तो परिवार को रोटी नहीं मिलेगी। यह खुद को उन्हीं मध्यम वर्गीय परिवारों के रूप में पेश करते हैं, जो कमाते तो ठीकठाक हैं, मगर ईएमआई चुकाने में परेशान रहते हैं। ऐसे परिवार हर शहर व कस्बे में होंगे, गरीब तो हैं पर वे खुद स्वीकारते नीं और समाज समझ नहीं पाता।
जर्जर हवेलियों में रह रहे पुराने रईसों के वंशजों के घरों में पड़ने लगे फाके पुरानी शान ने मांगने भी न दिया पक्के घर, ऊंची जाति और घर में बिजली जैसी वजहों से गरीबों वाली सरकारी सुविधाएं भी नहीं